विकास की तलब और नज़रअंदाज़ किया नतीजा!!!

आज चारों ओर जहां देखो वहां चौड़ी सड़के, ऊंची इमारतें, शॉपिंग मॉल्स, कॉम्प्लेक्स। सब कुछ देखने में कितना हसीन लगता है। तेज़ी से दौड़ती- भागती दुनियां, ब-दस्तूर माहौल। सिर्फ और सिर्फ तरक्की उर्फ़ विकास की तलब। कहते है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। पर यहां कुछ सब कुछ हो गया है।
रेल की पटरियों के लिए तमाम जंगल, घाटियां कट गई। एक शहर बसाने के लिए कितने पेड़ो, जंगलों को काटा गया। एक और उदाहरण से समझिए। बिजली उत्पादन के लिए कई पॉवर प्लांट का निर्माण हो रहा है। 500MW का एक conventional coal-fired पावर प्लांट में 26.5 m^3 पानी प्रति मिनट उपयोग होता है।
आज जंगल भी छोड़िए जनाब सड़कों के किनारे वाले पेड़ बचे नहीं। एक पीपल का पेड़ दिन और रात दोनों ऑक्सीजन रिलीज़ करता है। एक 100 फीट का पेड़ जिसके बेस का व्यास 18 फीट हो वह 6000 पाउंड ऑक्सीजन प्रदान करता है। लेकिन यदि आप उस पेड़ को काट दे और उसकी जगह कोई पौधा लगाते है तो उसे पेड़ बनने में 8-10 साल का समय लग जाता है। कहीं ये सौदा आपको मंहगा तो नहीं पड़ रहा।
एक साधारण मनुष्य 95 टन वायु एक वर्ष में लेता है। उस वायु का 23% ऑक्सीजन होता है। देखा जाए तो 740kg ऑक्सीजन प्रति वर्ष आवश्यक होता है अतः हम यह अनुमान लगा सकते है कि एक मनुष्य के लिए 7-8 पेड़ो की आवश्यकता है।

आज भारत की आबादी की आबादी 13,68,818,736 है याने कि 9,581,731,152 पेड़ जरूरी है। भारत की भूमि का क्षेत्रफल 7,08,273 km^2 है जिसका सिर्फ 21.54% हिस्सा जंगल है। परिणाम यह है की कितने जानवरो ने अपने घर खो दिए, घर तो छोड़िए जनाब अपना अस्तित्व ही खो दिया। कितनी प्रजातियां विलुप्त हो गई या उस कगार पे पहुंच गई। यह धरती हमारी बपौती नहीं। किसने हमे ये अधिकार दिया कि हम इस पर कब्ज़ा कर इसका विनाश करे।
हम अगर उनके  बारे में नहीं सोच सकते तो अपने बारे में ही सोच ले। आज हर दूसरे घर में लोग कैंसर से पीड़ित है। दमा, मोतियाबिंद तो जैसे आम बीमारी है। प्रदूषण अपनी चरम सीमा पर है। भूजल नीचे जा रहा। नदिया सूख रही। आने वाले सालों में पीने के लिए भी पानी होगा या नहीं इसका अनुमान लगाया जा सकता है। उच्चतम तापमान इस वर्ष 48°C तक रिकॉर्ड किया गया है। 

हमें शर्म आनी चाहिए कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को शुद्ध वायु, जल, तक नहीं दे सकते। हम मरने से पहले ये सोच लेते है कि हमारी औलाद के लिए इतनी दौलत छोड़ जाएं कि उन्हें कभी परेशानी न हो। पर हवा और पानी  जिसके बिना जी ही नहीं सकते उनके बारे में क्यों नहीं सोचते??!!!    

 ‘ मौत तो इक दिन सबको आनी है, चलो उससे पहले इस मिट्टी के लिए कुछ कर ले जिसने हमें पैदा किया है। ‘